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मोदी की कविता  मुझे किसी को मापना नहीं है        मुझे किसी को मापना नहीं है मुझे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध नहीं करनी है। मुझे तो नीर-क्षीर के विवेक को ही पाना है। मेरी समर्पण-यात्रा के लिए यह सब जरूरी है। इसीलिए इस शक्ति के उपासना का केंद्र स्व का सुख नहीं बनाना है। मां.. तू ही मुझे शक्ति दे- जिससे मैं किसी के भी साथ अन्याय न कर बैठूं, परंतु मुझे अन्याय सहन करने की शक्ति प्रदान कर। (साक्षी भाव से) नरेंद्र मोदी
 मोदी की कविता  मां.. मुझे कुछ भी मांगना नहीं है       मां.. यह याचना नहीं, मुझे कुछ भी मांगना नहीं है। मुझे तो इस जगत को जोड़ने वाली अप्रतिम प्रेम-सृष्टि 'स्व' के साथ नहीं त्वम के साथ सर्जन पाती है त्वम के साथ ही विलीन हो जाती है और इसीलिए  प्राप्त करना है ये भाव-जगत। मां.. मुझे शंका-कुशंका आशा-निराशा भय-चिंता सफलता-असफलता, पाना या खो देना आदि सर्व भावों से मुक्त कर । मां.. मुक्त कर । (साक्षी भाव से) नरेंद्र मोदी
मोदी की कविता   कैसे कठिन पल होते हैं ?         भूखे-सूखे खेत हों, धरा ताप से तपी हो, कितने-कितनों के आशा-अरमान के अंकुर फूटते हैं। आंखों में छोटे-छोटे स्वप्नों की लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। परंतु अचानक ही पवन के एक झोंके से ये बादल बरसे बिना ही बिखर जाएं- तब ? अरे रे ! कैसे कठिन पल होते हैं ?  (साक्षी भाव से) नरेंद्र मोदी
मोदी की कविता मां.. मुझे शक्ति दे        मां, क्या कल सुबह का सूरज भी ऐसा ही उदित होगा ? अभी तो ऐसा ही लग रहा है अब कल के सूरज के उदित होने का समय ही कहां शेष है ! पल- दो पल में उदित हो जाएगा ! तो यह सूरज भी आज की पार्श्वभूमि में ही होगा क्या ? मां ! शब्द, भावना- सबकुछ अभी तो सुन्न बन बैठा हूं। मां, तू ही मुझे शक्ति दे- जिससे मैं किसी के साथ अन्याय न कर बैठूं, परंतु मुझे अन्याय सहन करने की शक्ति प्रदान कर। मां, देख न एक याचक की तरह रोज तेरे सामने याचना ही करता रहता हूं तू ही दात्री है, तू ही धात्री है, इसका विश्वास है।   (साक्षी भाव से) नरेंद्र मोदी
मोदी की कविता सपनों का खंडहर        सुबह का सूरज कुछ-न-कुछ भनक लेकर आता है परंतु आज का सूरज कुछ धुंधला कुछ बेचैन करनेवाला कोई चिंता पैदा करने वाला नहीं पता, मेरे स्वंय का कुछ लूटा जा रहा है ऐसे मिश्र भावों के साथ सूरज मेरे आस-पास घूमता रहता है मन और मेरे मध्य अद्वैत का सेतु क्यों सर्जन नहीं कर पाता है देखो कभी मैं यहां तो मन वहां कभी मन यहां तो मैं कहीं और, पल-दो पल में योजनों दूर यह मन कैसी छलांग मार चला जाता है ! (साक्षी भाव से) नरेंद्र मोदी 
मोदी की कविता  जीवन का अधिष्ठान      इतना जानने के बाद भी किसलिए निरपेक्ष भाव जीवन का अधिष्ठान नहीं बनता है? किसलिए जीवन कामनाओं से परे नहीं बनता ? जीवन कहीं स्वप्नों का चिरंतन स्मारक बन नवजीवन को गति और मति दोनों ही देता है, तो कहीं जीवन स्वप्नों का खंडहर बन आह और आंसू से छलकता है। इसीलिए तो निरपेक्ष भावपूर्ण जीवन की कामना करता हूं, याचना करता हूं! नरेंद्र मोदी 

अब बर्दाश्त नही होता......

अब बर्दाश्त नही होता...... दिल्ली, मुंबई, बनारस, जयपुर सब देखा हमने अपनों को मरते देखा , सपनो को टूटते देखा .... अख़बारों की काली स्याही को खून से रंगते देखा ! टेलीविजन के रंगीन चित्रों को बेरंग होते देखा ! आख़िर क्यों हम बार- बार शिकार होते हैं आतंकवाद का ? यह आतंकी कौन है और क्या चाहता है ? क्यों हमारी ज़िन्दगी में ज़हर घोलता है ? क्यों वो नापाक इरादे लेकर चलता है और हमें मौत बांटता है ? कोई तो बताए हमें , हम कब तक यूँ ही मरते रहेंगे.....? कब तक माँ की गोद सूनी होती रहेगी ? कब तक बहन की रोती आँखें लाशों के बीच अपने भाई को ढूंढेगी ? कब तक बच्चे माँ - बाप के दुलार से महरूम होते रहेंगे..... ? आख़िर कब तक ..............? यह सवाल मेरे ज़हन में बार - बार उठता है , खून खौलता है मेरा जब मासूमो के लहू को बहते देखता हूँ , न चाहते हुए भी आंखों को वो मंज़र देखना पड़ता है , न चाहते हुए भी कानो को वह चीख - पुकार सुनना पड़ता है । आख़िर कब तक ? आख़िर कब तक ?

धूमिल की कविता "मोचीराम "

मोचीराम की चंद पंक्तियाँ राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझेक्षण-भर टटोला और फिर जैसे पतियाये हुये स्वर में वह हँसते हुये बोला- बाबूजी सच कहूँ-मेरी निगाह में न कोई छोटा है न कोई बड़ा है मेरे लिये, हर आदमी एक जोड़ी जूता है जो मेरे सामने मरम्मत के लिये खड़ा है। और असल बात तो यह है कि वह चाहे जो है जैसा है, जहाँ कहीं है आजकल कोई आदमी जूते की नाप से बाहर नहीं है, फिर भी मुझे ख्याल रहता है कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच कहीं न कहीं एक आदमी है जिस पर टाँके पड़ते हैं, जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर हथौड़े की तरह सहता है। यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैंऔर आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’बतलाते हैं सबकी अपनी-अपनी शक्ल हैअपनी-अपनी शैली है मसलन एक जूता है:जूता क्या है-चकतियों की थैली है इसे एक आदमी पहनता है जिसे चेचक ने चुग लिया है उस पर उम्मीद को तरह देती हुई हँसी है जैसे ‘टेलीफ़ून ‘ के खम्भे परकोई पतंग फँसी है और खड़खड़ा रही है। ‘बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूँकते हो? ’मैं कहना चाहता हूँ मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है मैं महसूस करता हूँ- भीतर सेएक आवाज़ आती ह...

बच्चन की "मधुशाला"

मधुशाला की चंद पंक्तियाँ आपके लिए मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, 'किस पथ से जाऊँ? ' असमंजस में है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ - 'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'।   मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला, हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला, ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का, और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला। सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला, सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला, बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है, चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला। लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला, फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला, दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं, पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला। जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला, जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला, ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है, जलने से भयभीत न जो...

हमें आगे बढ़ना होगा , बढ़ना होगा आगे.......

हमें आगे बढ़ना होगा... आज भले ही हम इक्कसवीं शताब्दी में जी रहे हों मगर हमारी ज़मीनी हकीक़त कुछ और ही है । आज भी इस देश की इक्कीस प्रतीशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जी रही है । जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग मध्य वर्ग इसी संतोष में जी रहा है की आज नही तो कल उसका सपना जरुर पूरा होगा । हाँ, यह बात जरुर है की आर्थिक उदारीकरण ने इनके सपनो को कुछ हद तक पूरा भी किया है । मगर मंजिल अभी बहुत दूर है । बिहार की बाढ़ में लाखों बह गए । कौन है जिम्मेदार ? आतंकवाद के भेंट हजारों चढ़ गए । कौन है जिम्मेदार ? आज़ादी के साठ साल पूरे हो चुके हैं । नेता, नौकरशाह अमीर हो गए , स्विस बैंक में देश का अरबों रुपयें जमा है । परन्तु देश क़र्ज़ में डूबा है, हम तीसरी दुनिया के लोग कहलाते हैं । कौन है जिम्मेदार ? कहीं हम तो नही ? ज़रा सोचिए! इसलिए मैं कहता हूँ........ हमें आगे बढ़ना होगा , बढ़ना होगा आगे पग-पग पर हैं काटें उनको फूल बनाना होगा हमें आगे बढ़ना होगा , बढ़ना होगा आगे । चाहे सूनामी आए या आए भूकंप कहीं पर लड़ना होगा इससे हमको जितना होगा इसको हमें आगे बढ़...

भारत की जनता.....

भारत की जनता बहुत पहले एक कविता भारतीय जनता की स्थितियों को लेकर लिखा था.... एक ऐसी जनता जो दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र में रहती है, जिसे अपना सरकार चुनने की छूट है, जो अपने देश के भाग्यविधाताओं के किस्मत का फैसला अपना मत देकर करती है, बड़ी ही गरीबी, लाचारी, और तंगहाली में जिंदा रहती है । इस देश की बड़ी संख्या आज भी अभावों में जी रही है । उसे कोई फर्क नही पड़ता की प्रधानमंत्री अमेरिका के साथ क्या डील करते हैं ? उसे मतलब है की किसी तरह उसे पेट भर भोजन मिल जाय। देश में सूचना क्रांति आए या फिर यह देश परमाणु शक्ति से संपन्न हो जाय, उसे कोई फर्क नही पड़ता । मगर धीरे- धीरे ही सही वह जनता अब जागने लगी है । तभी तो इस बार बाहूबलियों और बेईमानों को नानी याद आ गई और संसद से महरुम होना पड़ा । यह है भारत की जनता भूखी नंगी है यह बेबस - लाचार है खोई -खोई है यह सोई - सोई सी है । क्या कहूँ मै तुमसे , कि कैसी है यह ? ख़ुद पर रोती है यह फिर भी जीती है यह । ताकत इनके है पास फिर भी है आभाव इनकी है यह कहानी गरीबी निशानी । बढ़ती संख्या की बोझ अधूरी शिक्षा की सोच लिए चलते हैं यह फिर भी आगे...